ग़ज़ल

वक़्त रहते, वक़्त के साँचे में ढलना चाहिये
बेहतरी के वास्ते ख़ुद को बदलना चाहिए
भूख, बीमारी, ग़रीबी, तंग हाली, रोज़गार
इन सवालों का कोई तो हल निकलना चाहिए
कोई मज़हब हो कोई भी धर्म हो या जाति हो
हर किसी पर एक सा क़ानून चलना चाहिए
वंचितों को मुफ़्त शिक्षा देने का संकल्प लें
सच्चे झूठे वादों से उन को न छलना चाहिए
कोई भी इस देश को नुक़सान पहुँचाए अगर
हम सभी की धमनियों में खूँ उबलना चाहिए

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Comments

  • बहुत ख़ूब ....उम्दा ग़ज़ल हुई जनाब
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