अब हम

ज़ुल्मो सितम ग़वारा अब हम नहीं करेंगे
इन्सानियत को पारा अब हम नहीं करेंगे

अफ़लाक़ से गिरे हैं हुक्मे उदूल होकर
ग़ल्ती वही दोबारा अब हम नहीं करेंगे

तालीम को परे कर हमने किया ख़सारा
ख़ुद को ही बेसहारा अब हम नहीं करेंगे

क़ौमों की क़िस्मतें हैं यकजाने हिक़्मो मिल्लत
ये मेरा ये तुम्हारा अब हम नहीं करेंगे

सींचेंगे मेहनतों से ख़ुशियों की क्यारियों को
शिकवो अलम गवारा अब हम नहीं करेंगे

हिफ़्ज़ो अमां को पहुंचे जिस्से कोई अज़ीयत
कोई बुलन्द नारा अब हम नहीं करेंगे

हम जां नशीं है इसके हिन्दोस्तां हमारा
हिजरत कोई दोबारा अब हम नहीं करेंगे

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

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