जो लोग ज़ी-हिस हैं उनके पीछे ही मसअले हैं
वो चैन से हैं जो आँख मूँदे पड़े हुए हैं
 
जफ़ा परस्तों को है मयस्सर सुकूँ की नींदें
वफ़ा की क़िस्मत में इज़तिरारी है, रतजगे हैं
 
सितम का सूरज अज़ल से झुलसा रहा है इनको
दरख़्त सब्र-ओ-रज़ा के फिर भी तने खड़े हैं
 
दिखावे का इख़तिलाफ़ है इन मुनाफ़िक़ों में
ये लोग आपस में ख़ूब गहरे मिले हुए हैं
 
हमें भुला कर तू अपनी दुनिया में खो गया है
इधर हमें नाग तेरी यादों के डस रहे दिन
 
है अज़्म मोहकम तो सीना ताने में चल रहा हूँ
वगरना रह में हसद के कांटे बिछे हुए हैं
 
वो नस्ल दर नस्ल ऐ शाद पसमांदा ही रहेंगे
जो ख्वाबे ग़फ़लत में अब भी बेफ़िक्र सो रहे हैं
 
शमशाद शाद، नागपुर
+91 9767820085
 
ज़ी-हिस = भावुक
E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of Sukhanvar International to add comments!

Join Sukhanvar International

Comments

  • वाहः वाहः शाद भाई हमेशा की तरह लॉजवाब
  • behtareen murassa' ghazal
  • अच्छा कहते हैं भाई शमशाद जी।
  • Lajwab, behtareen ghazal hui Shamshad bhai.
    • आभार आप की मोहब्बतों का
This reply was deleted.

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा

Designed and managed by Shesh Dhar Tiwari for Sukhanvar International