ख़्वाहिशों को जो मार रखते हैं
ज़ब्त पर इख़तियार रखते हैं
 
ये ज़रूरी नहीं लगें ग़मगीन
वो जो ग़म बेशुमार रखते हैं
 
इस तरक़्क़ी के दौर में भी जनाब
ख्व़ाब पर ऐतबार रखते हैं
 
रास्ता भूलते नहीं अपना
ये सितारे मदार रखते हैं
 
जब हो मिल्लत का मसअला दरपेश
हर अमल दरकिनार रखते हैं
 
पहले रखते थे दिल में यार का ग़म
अब ग़म-ए-रोज़गार रखते हैं
 
हम मुस्लमान अपने सीने में
सब्र का कोहसार रखते हैं
 
शाद हम जैसे साहिब-ए-ग़ैरत
कब किसी का उधार रखते हैं
 
शमशाद शाद, नागपुर
+91 9767820085
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Comments

  • ये ज़रूरी नहीं लगें ग़मगीन
    वो जो ग़म बेशुमार रखते हैं
    वाह खूब
  • ख्वाहिशों को जो मार (कर) रखते हैं, कर की कमी लग रही है, इसीलिए मिसरा अटपटा लग रहा है।
    कुछ सोचिए, आप कर लेंगे।
  • बेहतरीन ग़ज़ल साहब
  • अच्छी ग़ज़ल है भाई लेकिन मतले का ऊला नज़रे सानी चाहता है।
    • कैसे सर जी ?
  • Behtareen ghazal. Lajwab ashaar.

    ये ज़रूरी नहीं लगें ग़मगीन
    वो जो ग़म बेशुमार रखते हैं

    इस तरक़्क़ी के दौर में भी जनाब
    ख्व़ाब पर ऐतबार रखते हैं
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