ग़ज़ल

अजब है इश्क बीमारी से बचिए
मुहब्बत में अदाकारी से बचिए ।

कहेगा क्या जमाना जानता हूँ ।
मग़र ख़्वाबों की बेगारी से बचिए।

सभी मतभेद सुलझाएंगे मिल के
मग़र अफवाह की आरी से बचिए ।

करो कुछ काम यारों मुफ़लिसों के
अजी सरकार मक्कारी से बचिए।

गिरेबां चाक हो जाएगा तेरा
निगाहों की पलटवारी से बचिए।

अना अपनी बचा रखना कि यारों
बला ए इश्क ए लाचारी से बचिए।

जला देगी नशेमन कम न समझो
जफ़ा की एक चिंगारी से बचिए ।

किसी का नाम क्या लेना यहां पर
अभी तो दिल की ऐय्यारी से बचिए।

भला हो या बुरा हो प्यार सबसे
ये झूठी सी तरफदारी से बचिए

न करना फर्क इंसानों में यारों
अभी तो इस समझदारी से बचिए।

न इनमें रंग ओ गुल खुशबू औ तेवर
तमन्नाओं की फुलवारी से बचिए ।

बुझा दे जो चिरागे अम्न खुद ही
हवाओं की तरफदारी से बचिए

लिखो जज्बात बस ग़ज़लों में पाठक
तरन्नुम और लयकारी से बचिए ।

#योगेंन्द्र पाठक

 

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Comments

  • तिवारी जी की बात से सहमत हूँ।
  • कई अशआर में शुतुर्गुरबा का दोष है। सानी में बचिए है तो ऊला में आप जैसे संबोधन ही आएँगे।
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