अँधेरे जो हम दिल में पाले रहेंगे
बहुत दूर हमसे उजाले रहेंगे
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कोई भी न देगा हमें हक़ हमारा
जुबाँ पर हमारी जो ताले रहेंगे
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हमें ढालिये मत ज़माने के रँग में
हमारे चलन तो निराले रहेंगे
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कि काँटों भरी है डगर ज़िन्दगी की
हर इक पाँव में ज़ख़्म, छाले रहेंगे
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चुनावी है जबतक ये मौसम शहर का
वे ग़ुर्बत का परचम सँभाले रहेंगे
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अगर यूँ ही लड़ते रहे दोस्तों हम
कहीं फिर न मस्ज़िद शिवाले रहेंगे
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मेरी शायरी में बगावत भरी है
न कन्धों पे मेरे दुशाले रहेंगे
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किसी रोज़ गुलशन को कहना पड़ेगा
कहाँ तक भला सच को टाले रहेंगे
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राकेश दुबे "गुलशन"
05/04/2019
बीसलपुर

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