ग़ज़ल
मेरे मौला मुझे ग़ुरूर न दे।
हो जुदा अपने वो फ़ितूर न दे।।

छाँव भी मिल नहीं सके जिससे ।
मेरे आंगन में वो खजूर न दे।।

शख़्स अदना लगे जहाँ से मुझे।
वो बुलंदी मुझे ग़फू़र न दे।।

तिश्नगी भी मिटे न प्यासे की।
वो समंदर मुझे हुजूर न दे।।

आज भाई रकीब भाई का।
यूं नदी के किनारे दूर न दे।।

नाम तेरे बदल के लड़वा दूं।
जेह्न में मेरे वो फितूर न दे।।

बेअदब सब "अनीस " को कहते।
क्यों तू किरदार में शऊर न दे।।
- अनीस शाह "अनीस"

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