ग़ज़ल
हम सरेबज़्म यूंँ गुफ़्तार नहीं कर सकते।
अपने रिश्ते को तो अख़बार नहीं कर सकते।।

रक्खा रोजा है हमारी भी तो इन आँखों ने ।
बिना दीदार के इफ्तार नहीं कर सकते।।

सिर्फ़ सीने को निशाना हैं बनाते हरदम।
पीठ पर हम तो कभी वार नहीं कर सकते।।

कोई सोया है तो हम उसको जगा सकते हैं।
जागता हो उसे बेदार नहीं कर सकते।।

किसको कहते हैं अदब खूब हमें आता है।
तेरे कदमों में तो दस्तार नहीं कर सकते।।

अपने भाई को हराने के लिए हरगिज़ ही।
उसके दुश्मन को तरफदार नहीं कर सकते।।

क्या फ़राइज है "अनीस" अपने हमें है मालूम।
तेरे ज़ल्वों का तलबगार नहीं कर सकते।।
- अनीस शाह "अनीस"

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