ख़ुद को हम दे के थपकी सुलाते रहे
बारहा ख़्वाब आ कर जगाते रहे

क़ब्र पर साथ अदू के वो आते रहे
दफ़्न करके भी मुझको जलाते रहे

इक ग़ज़ल जो कही थी तेरी शान में
उम्र भर हम उसे गुनगुनाते रहे

अश्क करते रहे यूँ ग़मों से वफ़ा
आ के पलकों पे बस झिलमिलाते रहे

बादे मर्ग आयेंगे याद उनको बहुत
उम्र भर जो हमें याद आते रहे

ख़्वाहिशे जिस्म हावी रही इस तरह
रूह से हम निगाहें चुराते रहे

बात किसकी करें भूल जायें किसे
ख़ामुशी ओढ़ कर मुँह छिपाते रहे

आज मंज़िल पे हैं सिर्फ़ वो ही जो ख़ुद
रास्ता अपनी ख़ातिर बनाते रहे

मुझको उम्मीद उनके पिघलने की थी
सब्र को जो मेरे आज़माते रहे

दो मतले
212 212 212 212
आते की क़ैद

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