आज फिर अंतःकरण से रार कर लूँ
और थोड़ी देर तक मनुहार कर लूँ

शब्द जिह्वा पर किये हैं मौन धारण
दे सहज वाणी उन्हें साकार कर लूँ

हो सके तो आज रुक जाओ बटोही
जो तुम्हे भाये वही श्रृंगार कर लूँ

हर परिस्थिति में चला मैं सत्य पथ पर
इस परिष्कृत झूठ का प्रतिकार कर लूँ

मत परोसो अब मुझे सपने सलोने
मैं किसी से तो उचित व्यवहार कर लूँ

सच हताशा में स्वयम से कह रहा है
क्यूँ न मैं भी झूठ का व्यापार कर लूँ

कुछ सुलगते कुछ सिसकते शब्द पीकर
मौन को मैं क्यूँ न अंगीकार कर लूँ

सृष्टि के आरम्भ से जो है सुनिश्चित
क्यों नहीं उस अंत को आधार कर लूँ

शेषधर तिवारी

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Comments

  • शुक्रिया मीना जी
  • वाहवाह अति सुन्दर।
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