आँखों से शाह के भी, आँसू निकालता है
वल्लाह देखिये क्या, ज़र्रे का हौसला है

कमज़ोर आदमी को, झुक कर उठाइये तो
दिल का हर इक मुदावा, इस मश्क़ में मिला है

आज़ाद मुश्किलों से, है कौन इस जहां में
इनका तो हल भी इनसे,होकर ही मिल सका है

हर राह की रही है, इक मुख़्तलिफ़ ही मंजिल
अब सोच लो कि तुमने, क्या रास्ता चुना है

हर एक को दिया है, यकसाँ मुक़द्दर उसने
दस्तेकरम से ही बस, इसका क़ुफ़ुल खुला है

ऐ अहले इल्म शाइर, रोज़ी की फ़िक्र भी कर
भूखे भजन कभी क्या, भक्तों ने भी किया है

रोकेगा कौन, देखो, ज़न्नत के ख़्वाब तुम भी
दोज़ख में पाँव रखना, मुमकिन कहाँ रहा है

शेषधर तिवारी

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Comments

  • बहुत उम्दा वाह वाह
    • शुक्रिया हिना जी
  • वाह वाह बहुत सुन्दर सृजन।
    • धन्यवाद आदरणीया
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