तरही ग़ज़ल

थोडी़  देरी से मेरी उपस्थिति

बढी़ है और ताबानी हमारी।
कि सजदे में है पेशानी हमारी।।

मुसाफि़र है वो हर मंजि़ल का लेकिन।
बस इक है राह अंजानी हमारी।।

दिल-ओ-जाँ कर दिये कुर्बान तुम पर।
वफा़ तुम ने न पहचानी हमारी।।

समाअत में अभी तक गूँजता है।
कहा था तुम ने 'दीवानी हमारी'।।

ग़लत था चाँद को जुगनू समझना।
ये ही थी एक नादानी हमारी।।

सजाये बैठी है घरबार अपना।
कि वो है गुडि़या जापानी हमारी।।

सुखनवर तो सभी कहते है 'मीना'।
ग़ज़ल लेकिन है लासानी हमारी।।


मीना नक़वी

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