ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

कभी अहबाब से खाई, कभी झूठे खु़दाओं से।

हमेशा ज़क उठाई हम ने, अपने आश्नाओं से।।

अगर ईमान के गुलशन में, सच्चाई महकती हो।
बदलती देखी है तक़दीर , भी हम ने दुआओं से।

अभी कुछ देर पहले ही, तो खु़शबू गुल से निकली है।
मगर सरगोशियाँ करने लगा, सब्जा़ हवाओं से।।

ये इक तुम हो , गुनाहों पर, भी अपने फ़ख़्र करते हो।
ये इक हम हैं कि शर्मिन्दा हैं, नाकरदा ख़ताओं से।।

उदासी, बेबसी,बेचैनियाँ और रतजगे पैहम।
हमेशा से हमारा साबका़ है इन बलाओं से।।

दरख़्तों के तले सर-सब्ज़ होते ही नहीं पौधे।
ये देखा है कि नन्हे पेड़ जल जाते हैं छाँओं (छाँव) में।।

सदा मज़लूम की अक्सर डरा देती है जा़लिम को।
दहल जाती हैं दस्तारें भी बोसीदा रिदाओं से।।

अभी तक सोंधी मिट्टी की महक साँसों में आती है।
अभी तक रिश्ता है, 'मीना' हमारा सिर्फ़ गाँओं (गाँव) से।।

मीना नक़वी

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