ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़जल

जब घिरी कश्ती मेरी वक्त ए सफ़र तूफ़ान में।
दे गया दरिया भी कुछ गिरदाब मुझको दान में।।

यूँ किताब-ए-इश्क़ की तहरीर यकसर मिट गयी।
तोली जाती है वफ़ा अब झूठ के मीज़ान में।।

मरतकज़ किरदार पर रहती है दुनिया की नज़र।
एक लम्हा चाहिये रुस्वाई के एेलान में ।।

मुनत्ज़िर हूँ किस लिये मै अब किसी ताबीर की।
ख़्वाब जब दफ़ना दिये आँखों के कब्रिस्तान में।।

हाथ में काग़ज़ कलम है जेह् न में कुछ भी नहीं।
इक उदासी भर गयी है जिस्म में और जान में।।

उस से बिछड़े एक मुद्दत हो गयी 'मीना' मगर।
अब तलक ख़ुशबू बसी है रूह के गुलदान में।।
मीना नक़वी

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Comments

  • हमेशा की तरह एक बेहतरीन ग़ज़ल।
    • सादर आभार।
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