दोहा ग़ज़ल

 

वो  महकी  शेफालियाँ,कम हो गईं जनाब,
वो अमुवा की डालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

हाय  पश्चिमी  होड़  में ,गुम देसी परिधान ,
वो हँसली वो बालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

मँहगाई  के  दौर  में , फीके  सब  त्योहार,
वो होली - दीवालियाँ ,कम हो गईं जनाब।

 

इस विकास की दौड़ में,कटे वृक्ष चहुँ ओर,
खेतों  में  हरियालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

दिन -प्रतिदिन बढ़ने लगा,अंग्रेज़ी का शोर,
माँ हिन्दी को तालियाँ,कम हो गईं जनाब।

भरत दीप

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