मैं दर को दीवार कर चुका हूँ
यक़ीन करिए सुधर चुका हूँ

यूँ ज़ाहिरन दिख रहा हूँ ज़िंदा
हक़ीक़तन कब का मर चुका हूँ

मैं बिन मुहब्बत हूँ एक बनचर
ख़ुद अपने माज़ी को चर चुका हूँ

कोई तआरीफ़ कर दे थोड़ी
बहुत ज़ियादा सँवर चुका हूँ

बहूँगा जब तो डरेगी दुनिया
मैं पी के आँसू यूँ भर चुका हूँ

मुक़ाबला अब करूँगा डट कर
मैं कुछ ज़ियादा ही डर चुका हूँ

हों शाद अब दोस्त और दुश्मन
मैं आसमां पर उतर चुका हूँ

शेषधर तिवारी

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