ग़ज़ल

अपने अन्दर नाग के फन को कुचल कर बात कर

डस न ले तेरी ज़ुबां कुछ तो सँभल कर बात कर

 

कुछ तो तहज़ीबो-तमद्दुन में भी ढल कर बात कर

जोश में रख होश भीे मत यूँ उछल कर बात कर

 

अपनी तन्हाई की बाहों से निकल कर बात कर

ज़िंदगी की गोद में आकर मचल कर बात कर

 

ख़ामुशी की बर्फ में अहसास को जमने न दे

आ वफ़ा की धूप में तू भी पिघलकर बात कर

 

बंद कमरों में नहीं मिलती कभी ताज़ा हवा

आ कभी बाहर निकल छत पर टहल कर बात कर

 

हर घड़ी हर पल ही तू इनकार का पत्थर न बन

आ कभी इक़रार के साँचे में ढल कर बात कर

 

क्यों जलाता है तू ख़ुद को भी अबस इस आग में

मत ग़लतफ़हमी के पारे में उबल कर बात कर

 

क्या ज़माने में यही है कामयाबी का हुनर?

दिल की दिल में रख मगर लहजा बदल कर बात कर!

 

इसमें सन्नाटोँ की महफ़िल के सिवा कुछ भी नहीं

तू अना के इस जज़ीरे से निकलकर बात कर

 

यह भी मुमकिन है लगें काँटे भी फूलों की तरह

'द्विज' कभी तो प्यार के रस्ते पे चल कर बात कर।

 

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Comments

  • very nice
  • हर शेर उम्दा। बेहतरीन ग़ज़ हुई भाई जी।
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