परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ुश रहने के नाटक की है लाचारी क्या
नज़रें,लोग चुरा गुज़रेंगे, फिर कोई शिकवा मतकर

प्यासा एक समुन्दर जाने कितने दरिया लील गया
तू प्यासा है,एक बूँद की सागर से ,आशा मतकर

कुछतो म॔ज़िलतक जापहुॅचे ख़ुद राही ख़ुद रहबर थे
अपनी मंज़िल अपना रस्ता तयकर ले,सोचा मतकर

तेरे कुछ करने से कितना भला हुआ है औरों का
अगर नहीं ऐसा 'स्वरूप' तो कुछ ऐसा वैसा मतकर
स्वरूप(अगला-पड़ाव)-2005

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