मेरे जैसा एक मैं

मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़क
है कहाँ चौपाल, पनघट जानता कोई नहीं

बाल आधे उड़ गये हैं और आधे पक गये
वक़्त का आज़ार है ये हमनवा कोई नहीं

उम्र के इस मोड़तक जो साथ थे गायब हुए
अब हुआ तनहा सफ़र शिकवा-गिला कोई नहीं

थे अकेले ,हैं अकेले , रह अकेले जाएंगे
साथ में तनहाइयाँ हैं अन्यथा कोई नहीं
स्वरूप

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Comments

  • अन्यथा की जगह आश्ना पढ़ा जाय
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