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आज फिर अंतःकरण से रार कर लूँ
और थोड़ी देर तक मनुहार कर लूँ

शब्द जिह्वा पर किये हैं मौन धारण
दे सहज वाणी उन्हें साकार कर लूँ

हो सके तो आज रुक जाओ बटोही
जो तुम्हे भाये वही श्रृंगार कर लूँ

हर परिस्थिति में चला मैं सत्य पथ पर
इस परिष्कृत झूठ का प्रतिकार कर ल

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मैं दर को दीवार कर चुका हूँ
यक़ीन करिए सुधर चुका हूँ

यूँ ज़ाहिरन दिख रहा हूँ ज़िंदा
हक़ीक़तन कब का मर चुका हूँ

मैं बिन मुहब्बत हूँ एक बनचर
ख़ुद अपने माज़ी को चर चुका हूँ

कोई तआरीफ़ कर दे थोड़ी
बहुत ज़ियादा सँवर चुका हूँ

बहूँगा जब तो डरेगी दुनिया
मैं पी के आँसू यूँ

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बस एक ख़ता की जो, सौ बार सज़ा दोगे
इस तरह तो तुम मेरी, हस्ती ही मिटा दोगे

हालात से घबरा कर, जब मौत भी माँगूँगा
फित्रत है तुम्हारी ये, जीने की दुआ दोगे

ख़्वाहिश है तुम्हे अपना, हमराज़ बनाने की
डरता हूँ मुझे अपनी, नज़रों से गिरा दोगे

ताबीर की ख़्वाहिश में, कुछ

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नातवां है तू बहुत फिर भी न हारा शुक्रिया
तेरी हिम्मत ने दिया मुझको सहारा शुक्रिया

पास मेरे कुछ नहीं था जो कि दे पाता तुझे
तेरी सुहबत में हुआ फिर भी गुज़ारा शुक्रिया

ख़्वाहिशें पूरी हमारी हो सकें इसके लिए
इक न इक तू तोड़ देता है सितारा शुक्रिया

हो गया दी

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

कभी अहबाब से खाई, कभी झूठे खु़दाओं से।

हमेशा ज़क उठाई हम ने, अपने आश्नाओं से।।

अगर ईमान के गुलशन में, सच्चाई महकती हो।
बदलती देखी है तक़दीर , भी हम ने दुआओं से।

अभी कुछ देर पहले ही, तो खु़शबू गुल से निकली है।
मगर सरगोशियाँ करने लगा, सब्जा़

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अगर तुम राह में दो चार भी काँटे बिछा देते
हमारे पाँव के छाले तुम्हे कितनी दुआ देते

ख़ुदाया! तुम जो सहरा1 में कोई दरिया बहा देते
मुसाफ़िर को सराबों2 के फरेबों से बचा देते

कहेंगे शायरेनौ3 भी जमालीयात4 पर ग़ज़लें
पता होता तो ग़ालिब अपना दीवां ही जला देते

करें क

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ग़ज़ल

कागज़ों में बस चली है गाँव के इक रुट में
तब कहीं साहिब नज़र आये हैं मँहगे सूट में

सच खड़ा है ढीट बन, ये क्या तमाशा है मियाँ
नोट की ताकत मिला कर देखिये कुछ झूट में

शर्म आती है कि जगता ही नहीं उनका ज़मीर
एक हिस्सा जब तलक पाते रहें वो लूट में

देश अपनी चाल से च

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छोड़ कर चल दिए आज़माने के बाद
रो पड़ा आइना टूट जाने के बाद

बज़्म में अपनी मुझको बुलाने के बाद
चल दिए चार बातें सुनाने के बाद

कैसी फ़ितरत लिए लोग मिलते यहाँ
हाल पूछें मेरा घर जलाने के बाद

देख कर ग़ैर को बाम मलते हुए
आबले रो पड़े मुस्कुराने के बाद

लौट आई कफ़स

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आईने का मान

आईने का मान रखूँ
चेहरे पर मुस्कान रखूँ

राहगुज़र आसान रखूँ
मंज़िल पर ही ध्यान रखूँ

जग की भूल -भुलैयाँ में
अपनी कुछ पहचान रखूँ

क़र्ज़ अदा करना लाज़िम
क्यों उसका अहसान रखूँ

ख़ुद से यारी की शर्तें
मुश्किल या आसान रखूँ

मंज़िल दूर सफ़़र तनहा
कम से कम सामान रखूँ

पाँ

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आदमी से आदमी

आदमी से आदमी हैरान है
दोस्तो,ये मुल्क़ हिन्दुस्तान है

ढूँढ़िये उसको कहीं भी ढूँढ़िये
आदमी जो एक बा- ईमान है

आबरू,ग़ैरत,उमींदें और अना
बस हमारे पास ये सामान है

सच कहा,सौगन्ध खाकर सच कहा
न्याय की उम्मीद की,नादान है

आपका कितना असर है या पहुँच
बिक रहा तमगा,कहीं स

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ज़िन्दगी में दर्द से नज़रें चुराने के लिए
इक बहाना चाहिए था मुस्कराने के लिए

आप को तुम और तुम को तू कहा,अच्छा लगा
ये शगल भी लाज़िमी था पास आने के लिए

हाँ, वो पहले सी मुहब्बत अब नहीं बाक़ी रही
गुफ़्तगू होती रहे रिश्ता बचाने के लिए

क़ाफ़िले की भीड़ में तनहा

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आबला पा के लिए फूल बिछाने वाले
हम तुम्हें छोड़ के जन्नत भी न जाने वाले

मैं कहीं जी न उठूँ लम्स तुम्हारा पाकर
मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाले

तू जो कह दे तो ख़ताएँ वो दुबारा कर लूँ
जिनके अफ़साने नहीं होते सुनाने वाले

तेरी आँखों से निकल आये हमारे आँसू
वर्ना

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ग़ज़ल

 

मेरी उपस्थिति

वैसे तो बंदिशों के साये में हम पले हैं।
आँखों मे अब भी लेकिन , कुछ ख़्वाब मनचले हैं।।

आजा! कि तुझ को अपनी ,पलकों मे कैद कर लूँ।
मजबूरियाँ हैं कैसी, ये कैसे फा़सले हैं।।

दीवार-ओ-दर हैं सूने, मंज़र धुआँ धुआँ है।
बस्ती में दिल की शायद, जज़्बों

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आँखों से शाह के भी, आँसू निकालता है
वल्लाह देखिये क्या, ज़र्रे का हौसला है

कमज़ोर आदमी को, झुक कर उठाइये तो
दिल का हर इक मुदावा, इस मश्क़ में मिला है

आज़ाद मुश्किलों से, है कौन इस जहां में
इनका तो हल भी इनसे,होकर ही मिल सका है

हर राह की रही है, इक मुख़्तलि

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ग़ज़ल

 

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

साथ उसका मुझ को कल तक था मयस्सर--क्या हुआ।
सोचती रहती हूँ मैं मेरा मुक़द्दर --क्या हुआ।।

खु़शबयानी देख कर मैं आपकी हैरान हूँ ।
तीर वो अल्फा़ज़ के लहजे का खंजर --क्या हुआ।।

किस तरह एहसास ने पसपाई कर ली इख़्तियार ।
हो गया क्यों मुन्तशिर

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अदू को मो'तबर कर लूँ यही अरमान बाक़ी है
भले कमज़ोर है, दिल में यही तूफ़ान बाक़ी है

फलक पर दस्ताने कर चुका हूँ मैं रक़म अपनी
लिखा है अज़ सरे नौ सिर्फ़ इक उन्वान बाक़ी है

जहाँ थीं बस्तियाँ अब हैं वहाँ कंक्रीट के जंगल
रिहाइश के लिए बस शह्र इक वीरान बाक़ी है

मुक़द्दर

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तरही ग़ज़ल

थोडी़  देरी से मेरी उपस्थिति

बढी़ है और ताबानी हमारी।
कि सजदे में है पेशानी हमारी।।

मुसाफि़र है वो हर मंजि़ल का लेकिन।
बस इक है राह अंजानी हमारी।।

दिल-ओ-जाँ कर दिये कुर्बान तुम पर।
वफा़ तुम ने न पहचानी हमारी।।

समाअत में अभी तक गूँजता है।
कहा था तुम ने 'द

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2020 की पहली ग़ज़ल

2020 की पहली ग़ज़ल

ये भी मुमकिन है कि हमसे गुनाह हो जाये
ये भी मुमकिन है कि फिर भी निबाह हो जाये

ये भी मुमकिन है कि हो राह जानिबे मंज़िल
ये भी मुमकिन है कि मुश्किल ये राह हो जाये

ये भी मुमकिन है कि दोनों में प्यार हो ही नहीं
ये भी मुमकिन है ख़ुशी से निकाह

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ghazal

 

मेरी उस्थिति

हिजरत के परिंदों को जब याद ए शजर आई।
एक हूक उठी दिल में और आँख भी भर आई।।

तय कर न सका राही, किस सम्त चले आखि़र।
भटकी हुई मंजि़ल से जब राहगुज़र आई।।

फू़लों की तरह मेरे अफ़कार महक उट्ठे।
खु़शबू मेरे माजी़ की जब जेह् न में दर आई।।

जब जश्न ए बहारा

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ग़ज़ल

ज़िन्दगी का न फैसला करते।
तो न जाने हम और क्या करते।
زندگی کا نہ فیصلہ کرتے
تو نہ جانے ہم اور کیا کرتے

उड़ने का हम जो हौसला करते।
आसमां को ज़मीन का करते।
ادنے کا ہم جو حوصلہ کرتے
آسماں کو زمین کا کرتے

इश्क में आप से वफ़ा करते।
हक मुहब्बत का यूँ अदा करते।
عشق میں

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