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असरारुल हक़ 'मजाज़'

 

वो एक नर्स थी चारागर जिसको कहिए
मदावाये दर्दे जिगर जिसको कहिए

जवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थी
हवा चल रही थी कली खिल रही थी
वोह पुर रौब तेवर, वो शादाब चेहरा
मताए जवानी पे फ़ितरत का पहरा
मेरी हुक्मरानी है अहले ज़मीं पर
यह तहरीर था साफ़ उस

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माँ मत हो नाराज़ कि मैंने खुद ही मैली की न चुनरिया

 

मैं तो थी पिजरे की मैना क्या जानूँ गालियाँ गलियारे 

तू ही बोली सुबह कि जाऊं देखूँ मेला नदी किनारे 

मेला भी मेला कैसा पग पग पर बिछा जहाँ आकर्षण 

लाख दुकानें, लाख तमाशे, लाख नट नटी लाख प्रदर्शन 

फिर भ

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